टेराकोटा , गोरखपुर
                
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टेराकोटा या मिटटी की कला, एक ऐसी कृति है जो कि मिटटी से बनी तथा पकाने पर चमक रहित होती है व सामान्यत: लाल रंग की होती है। यह कुम्हार के चाक की गति का उत्पादक कार्यो में प्रयोग करने की भाति मानव सभ्यता का षिल्पकारी की दिषा में पहला कदम है। कुम्हारी कला तो सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से विधमान है और इस सभ्यता के एक स्थल मेहरगढ से इसके चिन्ह भी मिले है। मिटटी या टेराकोटा की बनी हुर्इ ऐसी अनेक लघु मूर्तिया वहा के अवषेषो में मिली है जिसमें गाय, कुत्ता, भालू, बन्दर आदि को गढा गया है। टेराकोटा का प्रयोग मूर्तिकला के इतिहास में कुम्हारी कला में र्इट बनाने एवं खपरैल बनाने में सदैव से होता आया है। मोहनजोदड़ो (3000-1500 र्इ0पू0) की खुदार्इ में मा़त्र शकित में सम्बनिधत पंथ की उपासना का संकेत देनेे वाली लिंग की आकृति वाली तथा स्त्री चित्रण की अनेक लघुकृतिया प्राप्त हुर्इ है। इसी प्रकार सुदूर मेसोपोटामिया में 1950 र्इ0पू0 के आस पास की मिलने वाली टेराकोटा की कलाकृतिया जिन्हें बर्नी नक्काषी भी कहा जाता है, इसी विधा की कृतिया है। प्राचीन ग्रीस(यूनान) सभ्यता में मिलने वाली तनाग्ता लघुकृतिया भी बड़े पैमाने पर उत्पादित की जाती थी। चीन के सम्राट जिन-षी-हुन की 210-209 र्इ0पू0 की टेरीकोटा सेना भी महत्वपूर्ण कला कृतित है। इसी प्रकार से नार्इजीरिया और पूरे अफ्रीका में इसके अनेक साक्ष्य मिले है। विक्टोरियन बर्मिघम में भी इसके अनेक उदाहरण मिले है।

पषिचम बंगाल के टेराकोटा पद्धति अन्य कृतियों की तुलना में कम लागत पर कृति तैयार करने की प्रकि्रया है। इसमें निर्मलस्वच्छ मिटटी को आंषिक रुप से सुखाकर साचे में ढाला जाता है, अथवा हाथ से निषिचत आकार दिया जाता है। ठीक से सुखाने के पष्चात इसे भटठी में पकाया जाता है और पकने के बाद बालू में ढककर सुखाया जाता है। भवन सज्जा में प्रयुक्त होने वाले अथवा अन्य उपयोगों में आने वाले टेराकोटा कृतियों पर चमक भी लायी जाती है। टेराकोटा का सामान्य लाल रंग लाने के लिए इनकी भटिटयों का धुआ निकलने दिया जाता है। जब कि काला रंग लाने के लिए घूओं को निकलने नही दिया जाता है।

भारत में टेराकोटा की समृद्ध परम्परा है और विभिन्न राज्यों में इसके श्रेष्ठ उदाहरण देखे जा सकते है। गुजरात सिथत थानागढ़ कच्छ की टेराकोटा कृतितयों के लिए और मुर्षिदाबाद, बीर भूमि और हुगली की टेराकोटा कृतिया लोककला वे शैली के लिए प्रसिद्ध है। हरियाणा के हुक्का व चिलम तथा पंजाब के रोपड़ लुधियाना आदि के फूलदान दीपक व खिलौनो की तथा मंदिरो की सूक्षम टेराकोटा कृतिया के लिए तथा मंदिरो की सूक्ष्म टेरामन्नत शैली की टेराकोटा कृतिया, भारत की समृध्द कला परम्परा की मिसाल है।

उत्तर प्रदेष राज्य की टेराकोटा कला की विषिष्ट पहचान है और इस शैली में अनूठा योगदान करने वाली है। खुर्जा की ग्लेज्ड(चमकदार) मिटटी की कृतितया नक्काषी का चित्रण करने के लिए प्रसिध्द है तो आजमगढ़ की काली कुम्हारी कला की रचनाए फुल पतितयों व ज्यामितीय रचनाओं के लिये तथा चिनहट(लखनऊ) की चमकदार कृतिया नीली व भूरे रंग की सफेद पृष्ठभूमि के सुदर अलंंकरण के लिए प्रसिद्व है। वही गोरखपुर की कृतिया सदियो के ज्ञान व परम्परा से सिचिंत पारम्परिक कला का एक अनूठा उदाहरण है और इस कला में घोड़े, हाथी, ऊट महावत के हौदे सहित, हाथी की कृतिया, गणेष व बुध्द की प्रतिमाओं, घेाड़ा गाड़ी ऊट गाड़ी, लैम्प शेड, झूमर अत्यादि के लिए प्रसिध्द है। यहा की कारीगरी विषेष रुप से से हस्तकला पर आधारित है तथा इसमें प्राकृतिक रंग का ही प्रयोग होता है, जिसका सायित्व भी अधिक है। स्थानीय कलाकारो द्वारा 1000 विभिन्न प्रकार की टेराकोटा की कृतितया तैयार की गयी है। ये मिटटी के कारीगर सामान्यत: प्रजापतिसमुदाय से है तथा मुख्य रुप से ग्राम आंैरगांबाद, भरवलिया, अमवा गुंलरिया, जंगल अकेला (सभी भटहट विकास ख्ांड) तथा चरगावा ब्लाक के पादरी बाजार, बेलवा रायपुर आदि में फैले हुए है।

गोरखपुर के इन ग्रामों में पिछलें 3-4 दषको में अब तक राष्ट्रपति पुरस्कार व 5 क्षेत्रीय पुरस्कार अनूठी चार व श्रेष्ठ कला को अक्षुण बनाये रखने तथा आगे बढ़ाने के लिए प्रदान किये जा चुके है। यहा पर विभिन्न शासकीय योजनाओं के परस्परानुबन्धन द्वारा भी कारीगरों व कलाकारों को काम के लिए शेड बनवाने प्रषिक्षण प्रदान करने के लिये व्यवस्थाओं तथा शोरुम से कलाकृतितयों को विक्रयकर लाभकारी बनाने की व्यवस्था भी हो सकी है तथा साथ ही यहा तक पहुच के लिये सडक निर्माण विघुतीकरण तथा नाली निर्माण आदि योजनओं पर भी ध्यान देकर इन्हें पर्यटको के लिए आर्कषण स्थल बनाने का कार्य भी प्रगति पर है। वस्तत: गोरखपुर का यह क्षेत्र एक आदर्ष पर्यटक गतब्य के रुप में माना जा सकता है, जहा भारत के विभिन्न हिस्सो से आने वाले पर्यटक व व्यवसायी अपनी पसंद व उपयोग की विभिन्न कलाकृतितयों को क्रय करने के लिये सदैव, ही तत्पर रहते है।

भारतीय डाक विभाग गोरखपुर की टेराकोटा कृतियों की इस अनूठी कला पर संस्मारक डाक टिकट जारी करने में अनुभूति करता है।

 
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