टेराकोटा , गोरखपुर
                
सामगि्रयों का एक संक्षिप्त परिचयूप

विष्व प्रसिद्ध टेराकोटा हस्तषिल्प ग्राम औरंगाबाद के षिल्पकारों द्वारा उत्पादित सामगि्रयों का एक संक्षिप्त परिचय-

जनपद गोरखपुर मुख्यालय से गोरखपुर-महराजगंज मार्ग पर उत्तर दिषा में 13 किमी चलने पर लंगडी गुलरिहा बाजार से 2 किमी पषिचम दिषा मं विष्व प्रसिद्ध टेराकोटा हस्तषिल्प ग्राम पंचायत औरंगाबाद सिति है। इस ग्राम पंचायत में दो राजस्व ग्राम औरंगाबाद व भरवलिया है, जो लगभग 48 हेक्टेयर क्षेत्रफल में सिथत है। राजस्व ग्राम औरंगाबाद में कुल 125 परिवार विभिन्न जातिें के निवास करते है, जिसमें 21 परिवार प्रजापति (कुम्हार) जाति के हैं। यही प्रजापति परिवार के सदस्य वर्तमान में इस विष्व प्रसिद्ध टेराकोटा का कार्य दक्षता से करते हैं और इन्ही के द्वारा प्रषिक्षित लोगों द्वारा आस-पास के ग्रामों जैसे भरवलिया लंगडी गुलरिहा बूढ़ाडीह अमवा एकला आदि में भी टेराकोटा हस्तषिल्प का कार्य किया जाता है। यहां तक कि दूसरे विकास खण्डों जैसे चरगांवा के ग्राम पादरी बाजार बेलवा रायपुर जं0 एकला न0-1, जं0 एकला नं0-2 आदि में भी टेराकोटा हस्तषिल्प का कार्य शुरू कर दिए गये हैं। इस हस्तषिल्प कार्य का मूल आधार ग्राम पंचायत औरंगाबाद भरवलिया बूढ़ाडीह में सिथत तालाबों की विषेष प्रकार की मिटटी है। इस कला को और उत्कृष्ठता देने के लिए रंग-रोगन की काबिस मिटटी ग्राम पंचायत बरगदही में रेडियो स्टेषन के पीछे अवसिथत तालाब एवं आस-पास के जमीनों में पायी जाती है। इस काबिस मिटटी के प्राकृतिक रंग के कारण ही यहां के टेराकोटा षिल्प की प्रसिद्धि विष्व स्तर पर है।

उपरोक्त ग्राम औरंगाबाद के हस्तषिल्प जो कुम्हार जाति के लोग है, जिनके कारण टेराकोटा हस्तषिल्प को विष्व प्रसिद्धि मिली, उनके पूर्वज इसी जनपद के विकास खण्ड खजनी के ग्राम रिक्सानारा के मूलत: निवासी थे, जो बड़े ही गरीबी अवस्था में जीवन-यापन कर रहे थे। इनमें से विजर्इ पुत्र घाटी नाम के व्यकित जिनकी उम्र 15-16 वर्ष थी, रोजी रोजगार के तलाष में घर से निकल पड़े और घूमते-घूमते ग्राम औरंगाबाद आ पहुंचे। यहां पहुचने पर उन्होने अपनी व्यथा यहां के जमीदार श्री रामसूरत उपाध्याय को बताया, जिन्होने इस ग्राम में थोड़ी जमीन देकर बसा दिया। री विजर्इ यहीं जमीदार के यहां कार्य कर अपना गुजर-बसर करते रहे। समय बीतने के साथ इनकी शादी बगल की ग्राम सभा अषरफपुर में हुर्इ। श्री विजर्इ धार्मिक आस्थावना व्यकित और देवी-देवताओं में सच्चे मन से विष्वास करते थे, जैसा कि उनके परिवार के सदस्यों ने बताया। उनके परिवार के सदस्यों द्वारा बताया गया कि उन्हे स्वप्न आया कि जमीदार के यहां काम करने के बजाय तुम पुष्तैनी धन्धा (कुम्हारगिरी) करों। उन्होने किसी तरह चाक इत्यादि की व्यवस्था कर यहीं के तालाब की मिटटी से मिटटी के कुल्हड़ बर्तन आदि बनाने का कार्य शुरू किया। समय बीतता गया। कालान्तर में इनके तीन पुत्र श्री सुखराज, श्री रामदेव व श्री श्यामदेव पैदा हुए, जो धीरे-धीरे युवावस्था आते-आते यहीं पुष्तैनी धन्धा अपना लिए। अब तक श्री विजर्इ द्वारा बर्तनों के साथ-साथ छोटी-छोटी हौदार हाथियों व मूर्तियों का निर्माण आरम्भ कर दिया गया था। पुत्रों ने भी उसे आगे बढ़ाते हुए उन कलाकृतियों को और उत्कृष्ठता प्रदान की। इनके मिटटी के बर्तन स्थानीय लोगों द्वारा क्रय कर लिये जाते थे, हाथियों की मूर्तियों आदि का उपयोग धार्मिक आस्थाओं से जुड़े लोगों ने खरीदना आरम्भ कर दिया, जिससे जनपद में धार्मिक स्थलों पर इनकी कलाकृतियां दिखर्इ देने लगी। इस देष के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू जी द्वारा अपने गोरखपुर आगमन के दौरान किसी पूजा स्थल पर इन कलाकृतियों को देखा गया। यह जानकारी करने पर कि यह कलाकृतियां औरंगाबाद में बनती है वे सीधे औरंगाबाद अपनी पुत्री इनिदरा जी के साथ आ गए और श्री विजर्इ के पुत्रोंं सुखराज, रामदेव व श्यामदेव से मुलाकात कर उनकी कलाकृतियो से प्रभावित होकर उन्हे दिल्ली आने का निमंत्रण दिया। फलत: श्री सुखराज अपनी पत्नी श्री धनेषरी देवी के साथ दिल्ली गए और वहां रहकर पं0 जवाहर लाल नेहरू द्वारा बतायी गयी सामगि्रयों को मूर्तरूप दिय, जिसमें मुख्य रूप से निर्मित 9 फीट का हौददार हाथी था, जिससे प्रभावित होकर तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद जी द्वारा श्री सुखराज को राष्ट्रीय हस्तषिल्प पुरस्कार दिया गया। वहां से वापस आने के बाद श्री सुखराज अपने भार्इयों के साथ अपना यही धन्धा करते रहे। समय-समय पर इनकी मूर्तियों का प्रदर्षन विभिन्न पुरस्कार योजनाओं के अन्तर्गत होता रहा, जिसमें इस परिवार के अब तक 9 लोग विभिन्न राष्ट्रीय एवं राजकीय हस्तषिल्प पुरस्कारों से पुरस्कृत हो चुके हैं:-

समय बीतने के साथ इन तीनों भार्इयों के बच्चे हुए और परिवार बढ़ता गया। पारिवारिक सदस्यता बढ़ने के साथ-साथ इनकी आमदनी को स्रोत कोर्इ दूसरा साधन न होने एवं इनके द्वारा बनार्इ गर्इ कलाकृतियों की बाजार में व्यवस्था न होने के कारण परिवार की आर्थिक सिथति बहुत अच्छी नहीं हो सकी। विकास खण्ड भटहट के तत्कालीन खण्ड विकास अधिकारी श्री दयाषंकर पाण्डेय जी ग्राम पंचायत विकास अधिकारी श्री जयकरन सिंह के साथ ग्राम औरंगा बाद में दिनांक 07.04.2001 को अपना भ्रमण करते हुए वे हस्तषिल्पी परिवारों से मिले और उनसे उनकी आर्थिक सिथति की जानकारी प्राप्त की और उनकी कलाकृतियों से प्रभावित होकर उनके परिवार में आय सृजन एवं इस कलाकृति को प्रोत्साहित करने के उददेष्य से तत्कालीन स्वरोजगार की योजना स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना में समूह गठन की सलाह दी। इनकी सलाह मानकर इस परिवार के सदस्यों ने एक समूह गठित की जिसका नाम लक्ष्मी स्वंय सहायता समूह रखा गया। आगे चलकर यह समूह 3.618 लाख रू0 वित्त पोषित हुआ और उसी धनराषि से इस समूह ने अपने कारोबार को और आगे बढ़ाया।

अब इस समूह के स्वरोजगारियों ने हस्त चाक के स्थान पर इलेक्ट्रानिक चाक का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया, जिससे उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुर्इ। इस समूह को और प्रोत्साहित करने तथा उत्पादित वस्तुओं को सुरक्षित रखने तथा बाजारी व्यवस्था को दृषिटगत रखते हुए तत्कालीन परियोजना निदेषक श्री इन्द्रदेव द्विवेदी जी द्वारा अवस्थापना मद से सभी स्वरोजगारियों हेतु वर्कषेड का निर्माण कराया गया तथा साथ ही साथ तालाब की मिटटी की सुरक्षा के लिए तालाब सौन्दर्यीकरण का कार्य कराया गया एवं सम्पर्क मार्ग औरंगाबाद को मुख्य मार्ग गोरखपुर -महराजगंज रोड तक पिच मार्ग का निर्माण कराया गया। इस समूह में निर्मित सामगि्रयों को विभिन्न प्रदेषों में लगने वाले प्रदर्षनीमेलों में सरकारी व्यय पर भिजवाया व मेलों मे ंस्टाल सुलभ कराया, जिससे इनके द्वारा बनार्इ गर्इ कलाकृतियों का प्रदर्षन व विक्रय देष के विभिन्न प्रदेषों में होने लगा। अब इस समूह के पास इस प्रचार-प्रसार के कारण मार्केंटिंग का अभाव नहीं रह गया। समय बीतने के साथ-'साथ आज सिथति यह है कि अपने देष के विभिन्न प्रदेषों से आर्इ हुर्इ मांगों के अनुसार इनकी कलाकृतियों का निर्माण एवं विक्रय किया जाता है और व्यापारी वर्ग के लोग इन्ही के गांव औरंगाबाद से ही इन कलाकृतियों को खरीद कर विक्रय हेतु ले जाते हैं, जिनमें से कुछ कलाकृतियों का नाम निम्न है।

उपरोक्त के अतिरिक्त लगभग 1000 अन्य प्रकार की कलाकृतियों का भी निर्माण किया जाता है। इस समूह द्वारा माह मर्इ से जून के दौरान सालभर के उपयोग हेतु मिटटी तालाब से निकालकर रख ली जाती है। कलाकृति के निर्माण हेतु सर्व प्रथम तालाब से निकाली गर्इ मिटटी को भिगो कर पैर से गुथते हैं फिर लहसुर (लोहे का चाक) से उसे तीन बार काटते हैंएवं पुन: पैर से गुथते है। इस प्रकार तैयार मिटटी को चाक पर ले जाते हैं। पूर्व में चाक डण्डे केे माध्यम से चलाया जाता था किन्तु तकनीकी विकास के फलस्वरूप इसमें बेयरिंग लगाया गया है। वर्तमान में चाक मोटर से चलाया जाता है, जिससे उत्पादन में वृद्धि हुर्इ है। चाक पर विभिन्न कलाकृतियों को हाथ द्वारा रूप दिया जाता है। ततपष्चात विभिन्न भागों को जोडकर कलाकृति तैयार की जाती है। अब कलाकृतियों का श्रृंगार किया जाता है। श्रृंगार के उपरान्त कलाकृति की रंगार्इ प्राकृतिक रंग से की जाती है। इसमें महत्वपूर्ण अवयव काबिज मिटटी है। इसके अतिरिक्त इसमें आम के पेड़ की छाल, कासिटक सोडा को ओखली में कूट कर छान कर इनका घोल बनाते हैं। इसी घोल में कलाकृति को डूबो कर निकाल लेते हैं एवं सुखाकर आग में 24 घण्टे पकाते हैं। इस प्रकार कलाकृति तैयार हो जाती है। यहां की कलाकृतियां केवल हाथ से बनायी जाती है एवं प्राकृतिक रंग (काबिस मिटटी) से रंग-रोगन की जाती है, जिसका रंग सामग्री के उपर अन्त तक वैसे ही बना रहता है, जबकि अन्य प्रदषों में टेराकोटा सामग्री का निर्माण सांचे द्वारा किया जाता है एवं बाजारू रंग से सामागि्रयां रंगी जाती है, जिनका रंग अधिक समय तक टिकाऊ नहीं होता और कुछ दिन बाद फीका हो जाता है। इन्ही विषेषताओं के कारण यहां टेराकोटा हस्तषिल्प विष्वप्रसिद्ध है।

आज इनके पूरे परिवार के लगभग- 70-80 लोग छ: पुष्त से इसी पुष्तैनी कला के धन्धे में दिन-रात तल्लीन रहते हैं। इस परिवार के सबसे बुजुर्ग श्री श्याम देव (उम्र लगभग 105 वर्ष) आज भी अपनी पुष्तैनी इतिहास बताते हैं। इस परिवार के श्री गुलाब चन्द एक ऐसे व्यकित हैं जो देष ही नहीं विदेषों में भी अपना नाम रोषन कर चुके हैं। सन 1986 में वे लन्दन गए और वहां पर अपनी कला का प्रदर्षन कर पुरस्कार प्राप्त कर चुकें है।

पुरस्कार प्राप्त व्यकितयों को जिला उधोग केन्द्र के माध्यम से उन्हे इस कार्य के मास्टर ट्रेनर का दर्जा दिया गया एवं 50 वर्ष की उम्र के बाद 1000 रू0 प्रतिमाह पेंषन की सुविधा दी जाती है। इनके द्वारा अपने पास-पड़ोस के गांव यथा भरवलिया, बूढ़ाडीह, अमवा, लंगडी गुलरिहा, बेलवा रायपुर, एकला आदि के नवयुकों को जो इसमें चेष्ठा रखते हैं, प्रषिक्षण भी दिया गया, जिसके कारण वर्तमान में इन गांवों में भी टेराकोटा हस्तषिल्प का कार्य अधिकांकष घरों में किया जाता है। स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत भरवलिया में ऐसे काम करने वाले एक समूह का गठन कर लिया गया है अन्य समूह बनाने की कार्यवाही की जा रही है। वर्तमान में संरक्षित यह कला गुरू षिष्य स्कीम के तहत 10-10 बच्चों के समूह में प्रषिक्षण दिया जा रहा है, जिसमें न्यूनतम 2 बच्चे अनुसूचित जाति के होते हैं। आषा ही नहीं पूर्ण विष्वास है कि इन समूहों द्वारा भी टेराकोटा हस्तषिल्प के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान भविष्य में प्रस्तुत किया जायेगा।

 
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