टेराकोटा , गोरखपुर
                
माटी का टेराकोटा रूप
भारत यूँ तो विविध कलाओं के माध्यम से विश्व में अपनी अद्वितीय पहचान बनाये हुए है, पर गोरखपुर (उ0प्र0) के उत्तर में बसे ग्राम औरंगाबाद के टेराकोटा (मिटटी के बर्तन, खिलौने व कलाकृतियाँ) की धूम देश ही नहीं, विदेशों में भी है।

यहाँ के शिलिपयों की उंगलियाँ जब चाक पर चढ़ी मिटटी के लोंदे से खेलती हैं तो नाना प्रकार की अदभुत कलाकृतियाँ जन्म लेती हैं। यहाँ के शिलिपयों का जादू लखनऊ के अम्बेडकर पार्क से लेकर राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डेन तक छाया हुआ है यहाँ की टेराकोटा मूर्तियाँ देश के अनेक संग्रहालयों में भारतीय धरोहर के रूप में तो संरक्षित हैं ही, जापान, अमेरिका, बि्रटेन, रूस, फ्रांस, तुर्की सहित कर्इ देशों के संग्रहालयों में भी संग्रहीत है। देश-विदेश में आयोजित अस्तशिल्प प्रदर्शनियाँ टेराकोटा की कलाकृतियों के बिना अधूरी-सी रहती है।

टेराकोटा कलाकृतियों के जन्म का श्रेय श्री श्याम देव जी को है। यह जानना दिलचस्प होगा कि यह कला राष्ट्रपति भवन तक कैसी पहुँची ? 1960 में जब श्याम देव जी अपने गाँव के डीह (देवस्थान) पर चढ़ाने के लिए हाथी, घोड़े, शेर आदि बनाया करते थे, केन्द्रीय डिजाइन केन्द्र, लखनऊ के अधिकारी गाँव के पास से गुजरे और उनकी नजर देवस्थान पर रखे हाथी वगैरह पर पड़ी। उन्होंने श्याम देव से सम्पर्क किया और उनकी कलाकृतियाँ भी खरीदी। तब से टेराकोटा को सरकारी तौर पर सम्मान मिलना शुरू हुआ और यह सिलसिला अब तक अनवरत जारी है। सबसे पहले 1966 में उनकी कलाकृति-घोड़ा पर भारत सरकार द्वारा 20 पैसे का डाक टिकट जारी हुआ। तत्पश्चात अनेक सम्मान पुरस्कारों के अलावा 1980 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेडडी के हाथों 'मास्टर क्राफ्टसमैन का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

टेराकोटा को आगे बढ़ाने के लिए विकास प्रशिक्षण केन्द्र विशुनपुरा बाबू चौरी चौरा गोरखपुर के परियोजना प्रबन्धक योगेश पाण्डेय से शिल्प कोटा के साथ इस परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये हस्तशिल्प में निरन्तर 15 वर्षों से द्वार-द्वार टेरा कोटा को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है। इस क्राफ्ट में कुम्हारों के साथ-साथ अनुसूचित जाति के लोग भी बहुत अधिक संख्या में कार्य कर रहे है। कुम्हारों ने जो कार्य किया उसका मिशाल अनेक राष्ट्रीय एवं राज्य पुरस्कारों को देखकर लगाया जा सकता है।

अनेक राष्ट्रीय व प्रादेशिक पुरस्कार प्राप्त तथा शिल्पकारों की कलाकृतियों को देश के लगभग सभी प्रधानमंत्रियों एवं राष्ट्रपतियों द्वारा सम्मान मिला है।

हम भारतीय स्टेट बैंक एवं पूर्वांचल ग्रामीण बैंक गुलहरिया बाजार के आभारी हैं जिसकी दृषिट हम जैसे माटी के कलाकारों को उसने समय-समय पर हमारी प्रदर्शनी-बिक्री प्रायोजित करायी है।

इस कार्य में विशेष कार्य कर रही स्थानीय एन0जी0ओ0 विकास प्रशिक्षण केन्द्र विशुनपुरा बाबू के परियोजना प्रबन्धक योगेश पाण्डेय ने अपने व्यकितगत सहयोग से इस कला को आगे बढ़ाने के लिए नित्य नये सहयोग एवं कार्यक्रम करते रहते हैं जैसे डिजाइन कार्यशाला, ट्रेनिंग मार्केटिंग, प्रदर्शनी क्राफ्ट बाजार एवं स्थानीय स्तर पर तमाम सेमिनार करके टेराकोटा को आगे बढ़ाने का कार्य किया इसमें जिले के जिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी, परियोजना निदेशक, बी0डी0ओ0 एवं तमाम अधिकारी, कर्मचारी सहयोग करते रहते है।

इस शिल्प का महत्व तब और बढ़ गया जब शिल्पकारों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा अन्य विभूतियों से सम्मान पाकर गोरखपुर का नाम विश्व में बनाया।

गोरखपुर जनपद के पिछड़े विकास खण्ड भटहट के ग्राम औरंगाबाद के कुम्हारों द्वारा शुरू की गर्इ इस कुम्हारी कला में अब भटहट व चरगावा के ग्राम भरवलिया, हाफिजनगर, अशरफपुर, गुलरिहा, जंगल एकला नं0 2 व शाहपुर समेत आस पास के कर्इ गाव के दलितों सहित अन्य जाति-वर्ग के ग्रामीणों ने इसे स्वरोजगार के रूप में अपना लिया है। इतना ही नहीं परम्परागत खिलौने-मूर्तियाँ बनाने वाले करीब आधा दर्जन से अधिक टेराकोटा शिल्प से जुड़े कर्इ ग्रामीण इंग्लैण्ड, सिडनी, बांग्लादेश, जर्मनी सहित देश-विदेश के पर्यटन व शिल्प कला मेलों में प्रभावी उपसिथति दर्ज कराकर सराहना बटोर चुके हैं।

भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त हस्तशिल्प कार्यालय सेवा केन्द्र वाराणसी द्वारा औरंगाबाद, गुलहरिया क्षेत्र के टेराकोटा शिलिपयों को हर संभव सहायता, प्रशिक्षण, बाजार व प्रोत्साहन संसाधन मुहैया कराती रही है। यह भी कहते हैं कि देश-विदेश स्तर पर प्रमुख शिलिपयों को कर्इ बार विदेश भी भेजा गया है। शीघ्र ही उन्हें स्थायी बाजार व विपणन केन्द्र उपलब्ध करा दिया जाएगा। दूसरी तरफ खण्ड विकास अधिकारी चरगावा भटहट उत्तर प्रदेश शासन व जिला स्तर पर मार्ग, आवास, मिटटी विशेष तालाब का सुन्दरीकरण व अन्य संसाधन मुहैया कराए गए है। शीघ्र ही उन्हें विधुत की जरूरत को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा आधारित संयंत्र व उप केन्द्र उपलब्ध करा दिया गया है । इन सबसे इतर टेराकोटा शिल्पी कहते हैं कि शासन प्रशासन स्तर पर स्थायी सुविधाएँ तो दिला दी गर्इ लेकिन मिटटी, पानी, बाजार आदि के रूप में मूलभूत सुविधाएँ नहीं मुहैया करायी जा सकी है। इससे वह कहीं मूलभूत जरूरतों के लिए परेशान रहते हैं तो माल तैयार होने पर बिचौलियों के हाथों लुटते है। फलत: मेहनत का उचित लाभ नहीं मिल पाता था

मालूम हो कि भटहट क्षेत्र के ग्राम औरंगाबाद में टेराकोटा शिल्प की शुरूआत परम्परागत कला के रूप में हुर्इ थी। पैतृक व्यवसाय के रूप में कर्इ पीढ़ी से कुम्हारी कला का कारोबार कर रहे प्रजापति समाज के लोगों को वर्ष 1980 में कुछ बाहरी व्यवसायियों से संरक्षण मिला। हालांकि वह संरक्षण इनका शोषण ही था लेकिन आधुनिक व पाश्चात्य कला उपलब्ध करा कर नये-नये प्रयोग कराए जो वह बाजार में पहुँचकर धनाढयों के घर की शीशा बनने लगे। श्री योगेश ने बताया कि औरंगाबाद के गुलाब चन्द, लक्ष्मीचन्द, रामचन्द्र आदि कर्इ कलाकार 1982, 86 व 88 में इंग्लैण्ड, सिडनी, आस्ट्रेलिया, हालैण्ड, बांग्लादेश सहित भारत वर्ष में कर्इ पर्यटन व हस्तशिल्प महोत्सवों में शामिल हो चुके है। इतना ही वह राष्ट्रपति पुरस्कार सहित कर्इ अन्य प्रदेश, राज्य व विश्वस्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित हो चुके है।, हस्तशिलिपयों को शासन-प्रशासन ने स्वयं सहायता समूहों से भी सम्बद्ध कर दिया है जिससे वह अब समूहबद्ध होकर सहकारिता के तहत टेराकोटा शिल्प का उत्पादन कर रहे है।

टेराकोटा शिल्प की कलाकृतियों के प्रदर्शन से राज्य व राष्ट्र स्तरीय पुरस्कार पाने वाले औरंगाबाद व आस पास के गाव के एक नहीं कर्इ शिल्पी राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्रियों से पुरस्कृत हो चुके है। भारत वर्ष के तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली डा0 राधाकृष्णन व प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू से औरंगाबाद के सुखराज प्रजापति राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके है तो रामचन्द्र प्रजापति प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल जी डी रेडडी तापसे एवं मुख्यमंत्री रामनरेश यादव से सम्मानित हो चुके है। पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेडडी और प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के हाथों राष्ट्रीय व राजकीय पुरस्कार तो पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से गुलाब चन्द्र प्रजापति राज्य स्तरीय के अलावा राज्य स्तरीय पुरस्कारों से शिवनन्दन लक्ष्मी व पन्ने लाल पुरस्कृत हो चुके है। गब्बू को टेराकोटा शिल्प प्रदर्शन में राष्ट्रीय पुरस्कार हो चुका है।
 
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